असंभव इच्छाओं के द्वीप पर बैठामै लगातार सोचता हूं तुम्हारे बारे में
किसी दुर्लभ सत्य सी तुम कौंधती होमघा नक्षत्र के घटाटोप अंधेरे में
घुमड़ते मेघ सा स्म्रति के आकाश मेंतुम्हारा स्मरण चस्पा हैचेतना की दीवार पर
main तुम्हे खोजता हूं उन अनाम क्षणों मेंजब मैनें तुम्हारा वरण किया था
aaj भी कुछ टूटता है बहुत गहरेधूप की बारिश के बीच
किसी राहगीर के पांव में कांटे कि तरहअंधेरे को चीरती रोशनी की लकीर सीतुम रोज गुजरती हो मेरे सामने से
मुझे देखकर भी न देख पाने की विवशताखुबी रहती है तुम्हारी आंखों में
विष्फोटसे ध्वस्त हुए शहर सालस्त और पस्त थरथराता रहता हूं मैं
काफी देर तलकरेल के गुजर जाने के बाद पुल की मानिंद- कैलाश पचौरी
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